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आस्ट्रेलिया इंडिया काऊन्सिल के सहयोग के द्वारा ।

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कार्यक्रम १२- दुनिया में आस्ट्रेलिया का स्थान

:: अंग्रेज़ी में सुनिए - विनडोज़ मिडिया प्लेएर : मिडिया-संबंधित सहायता

(संगीत : ग्लेन मिल्लर का शुश इटस ए मिलिट्री सिक्रेट एंड हिटस आफ द वार इयरस एलबम से द मार्डनएर्स)

स्यू सलेमन :

नमस्कार, स्यू सलेमन हमारी कढ़ी वर्तमान आस्ट्रेलिया के लिए आपके साथ है।

आज "दुनिया में आस्ट्रेलिया का स्थान" में हम उन शक्तियों पर नज़र डालेंगे जिन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध से विदेश नीति को बनाया है ...

युद्ध प्रसारण :

हम यूनाइटेड प्रेस से इस महत्वपूर्ण बुलेटिन के लिए इस प्रसारण को रोकते हैं... फ्लैश... वाशिंगटन, वहाइट हाउस, पर्ल हार्बर पर जापानी आक्रमण की घोषणा करता है, आगे की घटनाओं के लिए डब्ल्यू ओ आर सुनते रहिए... "

फ़्रेंक्लिन डी. रूसवेल्ट :

" जापान ने बिना चेतावनी के मलाया तथा थाइलैण्ड और अमरीका पर हमला किया है । हम अब पूरी तरह से इस युद्ध में हैं, हमारे अमरीकी इतिहास की सबसे बड़ी ज़िम्मेवारी । "

स्यू सलेमन :

जब जापानी लड़ाकू जहाज़ों ने 8 दिसंबर, 1941 को पर्ल हार्बर में डेरा डाले हुए अमरीकी प्रशात बेड़े पर बम बरसाए तो इससे अमरीका द्वितीय विश्व युद्ध में आ गया और इसके बाद इसने आस्ट्रेलिया का एशिया तथा अमरीका दोनों से जुडाव बढ़ा दिया ।

जापान के अचानक हमले के समय अधिकांश आस्ट्रेलियाई सेना यूरोप तथा भूमध्य सागर में नियोजित थी ।

परंतु ब्रिटेन ने आस्ट्रेलिया को यह आश्वासन दिया था कि सिंगापुर में उसका नौसैनिक अड्डा साम्राज्य की रक्षा करने के लिए रहेगा । पर्ल हार्बर के तुंरत बाद जापान की सेनाएं सिंगापुर की ओर तेज़ी से बढ़ी ।

विन्स्टन चर्चिल :

आज मैं हमारे देश, आस्ट्रेलिया तथा न्यूज़ीलैंड में बसे लोगों सें कह रहा हूँ जिनकी सुरक्षा के लिए अपनी जान की बाज़ी लगा देंगे । भारत तथा बर्मा में हमारे वफादार मित्रों, हमारे वीर सहयोगियों, डच तथा चीनियों और अमरीका के हमारे भाई-बंधुओं मैं आप सभी से भारी तथा दूर-गामी सैन्य हार की छाया में बोल रहा हूँ । यह ब्रिटेन तथा साम्राज्य की हार है । हम सिंगापुर हार गए हैं । "

स्यू सलेमन :

मेलबर्न के ला ट्रोब विश्वविद्यालय से इतिहासकार डेविड डे याद करते हैं कि किस प्रकार लेबर नेता जान करटीन ने यह तर्क दिया था कि आस्ट्रेलिया को अधिक आत्म निर्भर बनना चाहिए क्योंकि एक दो तरफा युद्ध में ब्रिटेन आस्ट्रेलिया की सहायता के लिए नहीं आ पाएगा ।

डेविड डे :

" यह 1937 के चुनाव का मुख्य मुद्दा था, करटीन ने रक्षा नीति के मुद्दे पर चुनाव लड़ा यह कहते हुए कि आस्ट्रेलिया को अपनी रक्षा करनी ही होगी, परंतु वह बचाव नहीं हो पाया फिर भी सिंगापुर करटीन के दिमाग में अभी भी हावी था तथा वह ब्रिटेन से थोड़ी बहुत आशा करने से अपने को रोक नहीं पाया । इसलिए नवंबर, दिसंबर, 1941 में जब वेल्स के युवराज तथा रीपल्स को सुदूर पूर्व में भेजा गया तो करतीन ने इसे ब्रिटेन द्वारा हमेशा वादा किए गए सुदूर पूर्व बेड़े के पहले कदम के रूप में देखा । उसने सोचा कि वादे को पूरा किया जा रहा था और वह उसकी निराशा का कारण था । बाद में दिसंबर में जब पर्ल हार्बर पर हमला किया गया तथा मलाया पर आक्रमण किया गया तो वह उसकी निराशा तथा अमरीका की ओर रूख करने का कारण था । उसने तब ही महसूस किया कि ब्रिटेन आस्ट्रेलिया की रक्षा के लिए नहीं आएगा । "

स्यू सलेमन :

अपनी पुस्तक "द पोलिटिक्स ऑफ वार " में डेविड डे इस बात को दिखाते हैं कि किस तरह यूरोप तथा पैसिफिक दोनों मोर्चों पर युद्ध से ब्रिटेन तथा आस्ट्रेलिया की सबसे बुरी सोच एक हकीकत बन गयी । मलाया पर जापानी हमले की आशंका में ब्रिटेन ने रायल नेवी की सहायता के लिए एक विमान वाहक भेजा था पर यह समय पर सिंगापुर नहीं पहुंचा ।

युद्ध के समय के आस्ट्रेलियाई कमांडर ले. जनरल बेनट ने 1945 में देश को बताया कि आस्ट्रेलिया अपनी रक्षा के लिए ब्रिटेन तथा सिंगापुर पर भरोसा करके काफी संतुष्ट था ।

ले.जनरल बेनट :

" सिंगापुर को सुदूर पूर्व में ब्रिटेन के पराक्रम का प्रतीक माना जाता था । इसका सामरिक महत्व सभी को पता था । निश्चित रूप से ब्रिटिश जनता यह जानकर स्तब्ध थी कि यह मात्र एक नौसेना का अड्डा था जिसमें भूमि वाले भाग की ओर कोई किलाबंदी नहीं था । इसकी उत्तर की ओर से होने वाले किसी आक्रमण से रक्षा नहीं की गयी थी । जापानियों ने इसीलिए उस दिशा से आक्रमण किया । मुझे उस शाम को अपने आस्ट्रेलिया के शिविरों का दौरा याद है और मैंने हमारे लोगों की दिल-तोड़ देने वाले निराशा महसूस की जो दुशमन को आगे बढ़ने से रोकने के लिए बहुत बहादुरी से लड़े और उसमे बुरी तरह हताहत हुए । वे संख्या में काफी कम थे । उनको हवाई सहायता नहीं मिली थी । ये दुर्भाग्यशाली युद्ध के लिए हमारे तैयार न होने के शिकार हुए और युद्ध के लिए तैयार होने में हमारी लापरवाही का मूल्य उन्होंने चुकाया, उस युद्ध के लिए जिसे हम होता हुआ देख सकते थे । हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यदि संयुक्त राज्य अमरीका इस युद्व में नहीं आया होता तो यह युद्ध बहुत लंबा तथा खर्चीला होता, वस्तुतः हम सोचते हैं कि क्या हम उनकी सहायता के बिना इसे जीत सकते थे । "

स्यू सलेमन :

इस रहस्योदघाटन से कि आस्ट्रेलिया अपनी सुरक्षा के लिए अब और ब्रिटेन पर निर्भर नहीं रह सकता, आस्ट्रेलिया ने एशिया तथा पैसीफिक के महत्व का दावा करने और इस क्षेत्र में मुख्य शक्ति अमरीका के साथ निकट संबंध बनाना शुरू किया ।

(पचास के दशक तक दक्षिण पूर्व एशिया संधि संगठन और आस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैण्ड, अमरीका का गठबंधन या ए.एन.ज़ेड.यू.एस. घटती हुई ब्रिटिश मौजूदगी को प्रतिस्थापित करने के लिए उभरा । )

इसके एशियाई पड़ोसियों के साथ आस्ट्रेलिया के व्यवहार का पहला परीक्षण तब हुआ जब इंडोनेशिया के राष्ट्रवादियों ने युद्ध के पूरा होने से पूर्व डच ईस्ट इंडीज से स्वतंत्रता की घोषण कर दी थी : यह आस्ट्रेलियाई विदेश नीति र्निमाण में एक र्निणायक घटना थी ....

डेविड गोल्डसवर्थी :

" यह पहली बार था जब हमने अपने को किसी एशियाई देश में किसी मुख्य राजनैतिक विवाद में शामिल पाया, और यह हमारे बिल्कुल पड़ोस में था । "

स्यू सलेमन :

प्राध्यापक डेविड गोल्डसवर्थी, जो कि "फेसिंग नार्थ " शीर्षक वाली आस्ट्रेलिया के एशिया के साथ संबंधों के दो खंड वाले इतिहास के संपादक हैं ।

डेविड गोलडसवर्थी :

" उस समय की सरकार जो मुख्यतः 1940 के दशक के अंत की चिफ़ली सरकार थी इस मुद्दे पर बुरी तरह उलझी हुई थी कि इंडोनेशियाई राष्ट्रवाद तथा स्वतंत्रता के बारे में क्या किया जाए । 1940 के दशक के अंत तक जब इंडोनेशिया स्वतंत्र हो गया, तब हम इस मुद्दे में इतने फंस चुके थे कि इसने आने वाले काफी लंबे समय तक एशिया की हमारी समझ को ढके रखा । केवल यह ही नहीं कि हम पहली बार किसी एशियाई मुद्दे में शामिल थे तथा जो हमारे देश के इतने निकट का था बल्कि हम मोटे तौर पर इसमें एशियाई पक्ष की तरफ से शामिल थे, यूरोपियाई पक्ष की ओर से नहीं और जो वास्तव में अभूतपूर्व था । इसीलिए मैं समझता हूँ कि यह उस समय आस्ट्रेलिया के लिए कुछ सीखने का बहुत ही महत्वपूर्ण अनुभव था । "

स्यू सलेमन :

क्या आप सोचते हैं कि यह एक डच औपनिवेशिक कब्ज़ा होने से सारा फर्क पड़ा ? यदि यह ब्रिटिश औपनिवेशिक कब्ज़ा होता तो क्या आप सोचते हैं कि आस्ट्रेलिया वही स्वतंत्रता के समर्थक का रुख अपनाता ।

डेविड गोल्डसवर्थी :

यह एक बहुत ही अच्छा प्रश्न है और फिर से एक जटिल प्रश्न । मैं सोचता हूँ कि हमारी ब्रिटेन को समर्थन देने की अधिकांश संभावना थी जैसा कि हमने मलाया में किया था, वहाँ भी 1940 के दशक से एक प्रकार का स्वतंत्रता आंदोलन चल रहा था । महत्वपूर्ण बात यह थी कि मलाया में लड़ाई साम्यवादी विद्रोह के खिलाफ थी और मलाया का हमारे लिए रणनीतिक तथा सामरिक महत्व था । युद्ध से पूर्व काफ़ी मात्रा में ब्रिटिश सेना आ गई और सिंगापुर तथा मलाया में ही अपना अड्डा बना लिया और युद्ध के पश्चात भी मलाया हमारे लिए उतना ही महत्वपूर्ण था । इस तरह हमें सुरक्षा कवच के लिए मलाया में ब्रिटिश के साथ संबंध बनाए रखना था । और यह भेद करना ज़रूरी है कि भले ही हमने 40 के दशक के अंत में डच के विरूद्ध इंडोनेशिया का समर्थन किया, पर हम ब्रिटेन की सहायता कर रहे थे न कि केवल उनका समर्थन ही कर रहे थे तथा उनकी अधिकाधिक सहायता कर रहे थे और 1950 के दशक के प्रारंभ तथा मध्य तक हम वास्तव में ब्रिटिश मलाया की रक्षा के लिए आस्ट्रेलियाई सेनाएं भेज रहे थे । हम जानते थे कि मलाया स्वतंत्र हो जाएगा पर कम से कम वह ब्रिटिश शर्तों पर होगा और समग्र रूप में हम उन्हें अपना लेंगे । पर आप यह नहीं कह सकते कि हम मलाया अथवा इस संदर्भ में सिंगापुर में औपनिवेशिक शक्ति के खिलाफ राष्ट्रवादियों का मज़बूती से पक्ष ले रहे थे । "

स्यू सलेमन :

1963 में संयुक्त राष्ट्र ने तीन उत्तरी बोर्नियों क्षेत्रों के साथ मलाया को जोड़कर मलेशिया और सिंगापुर की एक संघ के रूप में गठन की घोषणा की थी ।

इस घोषणा ने पड़ोसी इंडोनेशिया को उग्र निंदा करने के लिए भड़काया और राष्ट्रपति सुकर्णों ने इसे " एक नव उपनिवेशवाद " ढांचा कहते हुए इसके विरोध में अपने मुकाबले की नीति की घोषणा की थी ।

अमरीका अपने स्थिर, गैर-साम्यवादी इंडोनेशिया के प्रमुख उद्देश्य को बनाए रखने के लिए मलेशिया की ब्रिटिश राष्ट्रकुल द्वारा रक्षा किए जाने के उत्तरदायित्व को लेने पर सहमत नहीं हुआ ।

इस तरह जब ब्रिटेन ने मलेशिया की रक्षा के लिए सैन्य सहायता मांगी तो आस्ट्रेलिया एक दुविधाजनक स्थिति में था । वह ब्रिटेन के प्रति वफादर रहना चाहता था पर वह इस बारे में आश्वस्त नहीं था इंडोनेशिया की मलेशिया से सीधे सैन्य युद्ध होने की दशा में अमरीका उसकी सहायता के लिए आएगा या नहीं ।

डेविड गोल्डसवर्थी :

" यह आस्ट्रेलिया के लिए एशियाई कूटनीति में सचमुच पहली जटिल क्रिया थी, एक बहुत कुछ सिखाने वाला अनुभव । हम जैसे-तैसे इससे बच गए, भले ही हमने मलेशिया की रक्षा करने के लिए ब्रिटेन की सैन्य सहायता करने पर सहमत हुए थे या भले ही लड़ाई के दौरान एक स्तर पर उत्तरी बोर्नियों में आस्ट्रेलियाई तथा इंडोनेशियाई सेनाएं वास्तव में एक दूसरे से लड़ी थीं । हम इंडोनेशिया के साथ संबंध बनाए रखने में सफल रहे । हमें कहना ही होगा कि यह बहुत हद तक गारफील्ड बारविक, जो उस समय हमारे विदेश मंत्री थे, के व्यक्तिगत व्यवहार-कौशल के कारण हुआ था । आस्ट्रेलियाई सरकार में थोड़ा-बहुत श्रम का विभाजन था, रॉबट मैन्ज़ीस जो प्रधान मंत्री थे वे ब्रिटिश संबंध और कुछ हद तक अमरीकी संबंध को भी देख रहे थे, 50 के दशक में कैसी तथा 60 के दशक में बारविक जैसे विदेश मंत्री थे जिन्हें एशियाई आवयश्कताओं की एक बेहतर समझ थी और उस क्षेत्र में कूटनीति को बनाए रखने के लिए अपना श्रेष्ठ प्रयास कर रहे थे । अब आपने अमरीका का उल्लेख भी किया है, यदि हम मलेशिया में संकट में होते तो यह ज़रूरी नहीं था कि वे हमारी सहायता के लिए आते । आप उनसे आशा भी नहीं कर सकते थे क्योंकि 1960 के दशक के शुरू से जहाँ तक दक्षिण-पूर्व एशिया का संबंध है, अमरीका वियतनाम में अत्यधिक उलझा हुआ था । वस्तुतः वह आस्ट्रेलिया सहित पश्चिमी देशों की ओर वियतनाम के युद्ध को लड़ने के लिए उसका साथ देने के लिए देख रहा था । हमने अंततः हाँ कहा, ब्रिटेन ने इसके लिए साफ मना कर दिया कि वे वियतनाम के युद्ध में शामिल नहीं होंगे भले ही राष्ट्रपति जॉनसन ने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विलसन से 1960 के दशक के मध्य में यह कहा था, जो कि बहुत प्रसिद्ध है, चाहे आप वहाँ एक बैगपाइपर की पलटन भेज दीजिए पर मैं इसकी तब तक परवाह नहीं करता कि जब तक कि वियतनाम में ब्रिटिश झंडा है । विलसन ने बैगपाइपर की एक पलटन भी नहीं भेजी । परंतु हम सहमत हुए थे । इस तरह 1965-66 तक आस्ट्रेलिया, मलेशिया में ब्रिटेन तथा वियतनाम में अमरीका की सहायता के लिए अपनी सेनाएं साथ-साथ भेज रहा था । "

स्यू सलेमन :

आस्ट्रेलिया की वियतनाम के युद्ध में शामिल होने की इच्छुकता को 1966 में तत्कालीन प्रधानमंत्री हैरोल्ड होल्ट के अमरीकी राष्ट्रपति लिन्डन बेन्स जॉनसन को कहे गए एक कथन में समेटा जा सकता था ।

लिन्डन बी जॉनसन :

" जब आपके प्रधानमंत्री ने प्रतीकात्मक रूप में वाशिंगटन में उस समय दूर के एक युद्ध मोर्चे पर हमारे आदमियों द्वारा सामना किए जा रहे संकट के बारे में बोलते हुए कहा कि वह एल.बी.जे. का साथ अंत तक देंगे तो कोई भी अमरिकी ऐसा नहीं था जिसे यह नई जानकारी महसूस हुई हो । (तालियां) "

स्यू सलेमन :

तो आस्ट्रेलिया वियतनाम के युद्ध में अमरिका का साथ देने के लिए इतना इच्छुक क्यों था ?

मोनेश विश्वविद्यालय के राजनैतिक इतिहासकार पॉल स्ट्रेनजियो स्पष्ट करते हैं कि यह शीत युद्ध की सोच का तर्कसंगत निष्कर्ष था ।

पॉल स्ट्रेनजियो :

विशेषकर आस्ट्रेलिया के उत्तर में ही अधिकतर समस्या को देखने की प्रवृत्ति थी, क्योंकि वहाँ ही इस संबंध में युद्ध पश्चात के इस प्रकार के उतार-चढ़ाव हो रहे थे । इस तरह वे एक अखण्ड साम्यवादी डिज़ाइन की तरह थे जिन्हें अमरीका की अगुवाई वाले पश्चिमी देशों द्वारा रोका जाना था । उसके साथ ही इस क्षेत्र के 19वीं सदी में वापस चले जाने के प्रति आस्ट्रेलिया की गहरी आशंकाएं थी । और फिर द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात की अवधि में वे आशंकाएं और फल-फूल गईं थी क्योंकि उतार-चढ़ाव की संख्या बड़ी थी, चीन साम्यवाद के सामने ढह गया था, विशेषकर सुकार्णो के नेतृत्व में इंडोनेशिया पर साम्यवाद का बढ़ता हुआ नियंत्रण देखा जा रहा था । इस तरह कई समस्या के क्षेत्र थे और यह भय कि यह फिर से एक सीवनहीन साम्यवादी डिज़ाइन है और इसे कहीं न कहीं रोका जाना चाहिए । 1960 के दशक के प्रारम्भ तक वियतनाम वह स्थान बन गया जहाँ रेत पर रेखा खींची जानी थी ।

स्यू सलेमन :

तो वास्तव में आप कह सकते हैं कि आस्ट्रेलिया इस क्षेत्र में अपने सुरक्षा कवच के लिए अमरीका में अमीर तथा शक्तिशाली मित्रों की ओर देख रहा था ।

पॉल स्ट्रेनजियो :

" बिल्कुल सही, लेकिन उसमें एक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि यह इतना साधारण नहीं था कि उस समय की आस्ट्रेलियाई सरकार अमरीका की चापलूसी कर रही थी और आँख मूंद कर उनका अनुसरण कर रही थी । आस्ट्रेलिया ने इस विश्वास पर पर्दे के पीछे वियतनाम के युद्व में अमरीका के शामिल होने को सक्रिय रूप से प्रोत्साहित किया कि आपको आस्ट्रेलिया तथा एशिया के मध्य अमरीकी शक्ति का हस्तक्षेप करवाना ही पडेगा और, इसीलिए, जो कुछ भी इस क्षेत्र में अमरीकी सामरिक, सैन्य, आर्थिक हितों को बढाएगा, वह अच्छा है । और इसलिए हमने 1960 के दशक के प्रारंभ में वियतनाम में अमरीका के बढते हुए हस्तक्षेप को सक्रिय प्रोत्साहन दिया । "

स्यू सलेमन :

आप रेडियो आस्ट्रेलिया की कढ़ी वर्तमान आस्ट्रेलिया पर कार्यक्रम 12 - दुनिया में आस्ट्रेलिया का स्थान सुन रहे हैं ।

1972 के चुनाव में गफ विटलैम के नेतृत्व में लेबर सरकार के चुने जाने से वियतनाम में आस्ट्रेलिया की सैन्य उपस्थिति को पूरी तरह समाप्त करने और एक अधिक स्वतंत्र विदेश नीति पक्ष के विकास की शुरूआत हुई ।

पॉल स्ट्रेनजियो, फिर से .....

पॉल स्ट्रेनजियो :

" राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने 1971 में वह सिद्धान्त प्रतिपादित किया जिसे " निक्सन सिद्धान्त " के नाम से जाना जाता है जिसमें उन्होंने पूरी तरह यह स्पष्ट किया कि अमरीका की आने वाले समय में एशिया की मुख्य भूमि में किसी सैन्य युद्ध करने की संभावना नहीं है और दूसरा यह कि एशियाई देशों तथा एशिया-प्रशांत क्षेत्र को अपनी रक्षा में और आत्मनिर्भर होना पड़ेगा । इस तरह वही तर्क जिस पर आस्ट्रेलिया अमरीका की वियतनाम में सहायता कर रहा था, निक्सन उसी से पीछे हट रहे थे, और दूसरा यह कि उस समय चीन के साथ सम्बन्ध बढ़ रहे थे । और फिर तब विटलैम सरकार आई और यह उस संदर्भ में अपने को आस्ट्रेलियाई विदेश नीति को बनाने हेतु नई दिशाओं को खोलने की स्थिति में रख पाने में समर्थ थी, जिसने इसे कई बार अमरीका के साथ यदि टकराव की स्थिति में नहीं तो निश्चित रूप से कुछ स्तर के तनाव की स्थिति में रखा । "

स्यू सलेमन : मोनेश विश्वविद्यालय के पॉल स्ट्रेनजियो जिन्होंने गफ विटलैम के अगले पदाधिकारी तथा व्यापार मंत्री जिम केन्स की " कीपर ऑफ द फेथ " नामक एक जीवनी लिखी थी ।

गफ विटलैम 1971 में पीकिंग का दौरा करने वाले पहले आस्ट्रेलियाई राजनैतिक नेता थे । उसके अगले वर्ष आस्ट्रेलिया ने चीन के साथ कूटनीतिक संबंध स्थापित किए थे यद्यपि आस्ट्रेलिया 19वीं सदी से ही उनके साथ ऊन तथा अनाज का व्यापार कर रहा था : वे व्यापार संबंध जिन्हें 1970 के दशक के प्रारम्भ में फिर से मज़बूत बनाया गया था ।

गफ विटलैम ने पीकिंग का दूसरा दौरा 1973 में किया .....

गफ विटलैम :

" आस्ट्रेलिया विश्व तथा विशेषकर जिस क्षेत्र में वास्तव में है, के साथ अपने संबंधों की एक नई दिशा में बढ़ रहा है । जो मार्ग हम स्थापित कर रहे हैं वह पहले से ही स्पष्ट तथा प्रतिबद्ध है; हमारी चिन्ता केवल अब धरती के दूर-दराज़ के क्षेत्रों में बसे देशों के लिए ही नहीं है । अब हमारा संबंध सभी राष्ट्रों से है और विशेषकर उन राष्ट्रों से जिनके साथ हमारा समान वातावरण तथा समान हित हैं और जिनके साथ हम समानता के संबंध बनाना चाहते हैं । हम एक ऐसे भविष्य की ओर देख रहे हैं जिसमें किन्ही विशेष संबंधों पर अधिक ज़ोर दिया जाना उन उपयुक्त संबंधों को खराब नहीं करेगा जो आस्ट्रेलिया तथा उसके पड़ोसियों के मध्य होने चाहिए । "

स्यू सलेमन :

तो क्या 80 के दशक में शीत युद्ध का अंत और एशिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की अत्यधिक वृद्धि ने आस्ट्रेलिया को अपना ध्यान युद्ध के मैदानों से बाज़ार की ओर देने पर मजबूर किया ?

डेविड गोल्डसवर्थी, फिर से.....

डेविड गोल्डसवर्थी :

" आप कह सकते हैं कि यदि एशिया में बड़े देशों के माध्यम से आर्थिक तेज़ी नहीं आई होती तो शायद हम एशिया में आज जितनी रूचि दिखा रहे हैं उससे कम दिखा रहे होते । 80 तथा 90 के दशक में जो वैश्वीकरण का युग था, में आर्थिक कूटनीति में शामिल होना बहुत महत्वपूर्ण था जो 50 तथा 60 के दशक में शीतयुद्ध की अवधि में एशिया में आवश्यक सुरक्षा विचारों, सामरिक सोच से बहुत अलग था । तो सारी चीज़ें एक साथ हुईं, वैश्वीकरण हुआ, बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सभी कारणों से तीव्र आर्थिक वृद्धि हुई, शीत युद्ध का अंत हुआ; इसने एकाएक आस्ट्रेलिया तथा अन्य देशों के लिए एक अभूतपूर्व तरीके से नए क्षितिज खोल दिए और अर्थव्यवस्था तथा व्यापार पर से ध्यान नहीं जाएगा । इसलिए, भले ही आप कह सकते हैं और मैं सोचता हूँ कि सीधे तौर पर कहिए कि एक लंबे समय तक एशिया के लिए हमारे विचार मुख्यतः शीत युद्ध की सामरिक चिन्ताओं से बनते थे और इस प्रकार हम एशिया को एक युद्ध के मैदान के रूप में देखते थे जिसमें पश्चिमी शक्तियां, जिनमें हम भी एक थे, एक अधीनस्थ भूमिका में, पर फिर भी हम उनके साथ थे, साम्यवादी शक्तियों के साथ युद्ध करती थी । और फिर यह सब खत्म हो गया और लड़ाई के मैदान से बाज़ार की ओर परिवर्तन हुआ और एशिया एक ऐसा स्थान बन गया जहाँ आप व्यापार करें । आप कह सकते हैं कि यह हो गया, मैं कहता हूँ यह सरल है पर एक व्यापक सोच में हमारी स्थिति में इस प्रकार का परिवर्तन एक वास्तविकता थी । परन्तु कोई भी सरकार, आस्ट्रेलियाई सरकार भी नहीं, न ही वर्तमान आस्ट्रेलियाई सरकार कभी भी सुरक्षा तथा सामरिक आवश्यकताओं को पूरी तरह नजरअंदाज कर सकती है । और हम आज भी यह अपनी विदेश नीति में बहुत दृढ़ता से महसूस करते हैं कि जबकि आतंकवाद एक मुख्य मुद्दा है और जब विश्व के अन्य भागों में हथियारों वाली लड़ाई की संभावना है । वह सब देश के विदेशी संबंधों में अत्यधिक महत्वपूर्ण रहना ही चाहिए । "

स्यू सलेमन :

आस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री, जॉन हार्वड सितम्बर 11 के आतंकवादी हमले के समय अमरिका में थे ....

प्रधानमंत्री जॉन हार्वड : " सितम्बर 11 एक र्निणायक घटना थी । इसने यह दर्शाया कि अब आतंकवादियों के पास कितने खतरनाक साधन हैं जिनसे वह क्रूर सटीकता से कल्पना न किया जा सकने वाला आघात पहुंचा सकते हैं । यह हमला न केवल हमारे स्वतंत्र तथा मुक्त तरीके से अपना जीवन जीने की समर्थता के विश्वास को तोड़ने के लिए किया गया था; बल्कि यह विश्व के आर्थिक आधारों को हिला देने के लिए भी था । आस्ट्रेलिया सहित विश्व को प्रतिउत्तर देना चाहिए । "

स्यू सलेमान :

जहाँ आस्ट्रेलियाई सितम्बर 11, 2001 को हुए हमले पर प्रधान मंत्री के भय से सहमत हैं, वहीं 18 माह के बाद सरकार की ईराक में अमरीकी तथा ब्रिटिश सेना के साथ जुड़ने की इच्छुकता ने कुछ पूर्व- आस्ट्रेलियाई कूटनीतिज्ञों के मध्य काफी बेचैनी उत्पन्न की है ।

रिचर्ड वुलकॉट ने सात आस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्रियों तथा बारह विदेश मंत्रियों को परामर्श दिया है और वह 1988 से 1992 के मध्य विदेश मामले तथा व्यापार विभाग के सचिव थे ।

उनकी आत्मकथा, द हॉट सीट 1952 से आस्ट्रेलिया की विदेश नीतियों के विकसित होने और विशेषकर एशिया के साथ इसके संबंधों का पता लगाती है । रिचर्ड वूलकॉट इस बात के प्रति चिंतित हैं कि अमरीका की ओर इतनी तेजी से पलट कर सरकार ने इस एशियाई विचार को नया जीवन दिया है कि आस्ट्रेलिया एक एंग्लो-अमरिकी चौकी है और इस क्षेत्र के साथ उतनी सुखद स्थिति में नहीं है ।

रिचर्ड वुलकॉट :

" मैं इस क्षेत्र में काफी भ्रमण करता हूँ और मैं सोचता हूँ कि यह विचार फैल रहा है कि कुछ तरीकों से हम उस निकट तथा रचनात्मक संबंध से पीछे हट रहे हैं जो हमने 80 के दशक तथा 90 के दशक के प्रारम्भ में अधिकतर पूर्वी एशियाई देशों के साथ स्थापित किए थे । मैं सोचता हूँ कि इसके कई कारण हैं, पहला यह विचार कि हमने अपनी विदेश नीति का फिर से संतुलन बनाया है और पूर्व की तुलना में अमरीका की नीतियों के साथ और निकट से जुड़े हैं जो ईराक में सेना भेजने के निर्णय से झलकता है और वस्तुतः हमने यह केवल अमरीका तथा यूनाइटेड किंग्डम के साथ किया है । और मैं सोचता हूँ कि इसने दो चीजें की हैं, पहला कि इसने इस विचार को एक नया जीवन दिया है कि हम वास्तव में एक एंग्लो- अमरिकी चौकी हैं जो विश्व के उस क्षेत्र में जिसमें हम स्थित हैं, उसमे अपने को बिल्कुल भी सुरक्षित महसूस नहीं करते । मैं सोचता हूँ कि यह र्दुभाग्यपूर्ण है । दूसरा विचार जो शायद सत्य नहीं है परन्तु कुछ हल्कों में यह विचार है कि यह इस्लाम के विरूद्ध एक प्रकार के कृत्य के रूप में देखा जाता है । "

एलीसन ब्रोइनोवस्की :

" मै डिक से सहमत हूँ तथा यह केवल इसलिए नहीं है कि वह मेरे अधिकारी हुआ करते थे । यह छवि काफी लंबे समय से है, असल में 1940 के दशक से, जब आस्ट्रेलिया ने हमारे अमरीका तथा ब्रिटेन के साथ गठबंधन के कारण गुट-निरपेक्ष आंदोलन से जुडने के लिए मना कर दिया था । पर इस क्षेत्र में इसकी दृढ़ता लगातार बढ़ी है, यदि मैं इसे इस तरह कहूँ कि शायद हमारे हर समय इस पर ज़ोर देने से कि हमें अमरीका को इस क्षेत्र में सैन्य रूप से शामिल रखना चाहिए । "

स्यू सलेमन :

" एलीसन ब्रोइनोवस्की, एक भूतपूर्व सांस्कृतिक अटैचे तथा कूटनीतिज्ञ जिनकी पुस्तक अबाउट फेस - एशियन एकाउंटस ऑफ आस्ट्रेलिया, रिचर्ड वुलकॉट की आत्मकथा के थोडे समय बाद प्रकाशित हुई थी । "

एलीसन ब्रोइनोवस्की :

" सितम्बर, 11 के बाद प्रधान मंत्री को ए.एन.ज़ेड.यू.एस. गठबन्धन से आह्वान करने की कोई आवश्यकता नहीं थी भले ही वह उस समय न्यूयार्क में थे और निश्चित रूप से इसने उन्हें बहुत प्रभावित किया । उन्हें यह कहने की आवश्यकता नहीं थी कि इस कायर शत्रु के विरूद्ध जहाँ भी आप जाएंगे हम आपके साथ जाएंगे और जो भी आपको करना पड़ेगा हम भी वह करेंगे । उन्हें यह नहीं करना था, यह ए.एन.ज़ेड.यू.एस. गठबंधन के अन्तर्गत एक बाध्यता नहीं है । दूसरा, बाली के पश्चात जो स्पष्टतः आस्ट्रेलियाई तथा अन्य पश्चिमी पर्यटकों पर किया गया हमला था, हमारे पास ईराक में जाने के लिए की गई पहले की प्रतिबद्धता से पीछे हटने का अवसर था । हम अमरीका को कह सकते थे कि देखिए आपको यह समझना चाहिए कि हमारे पास हमारे दरवाज़े पर एक मूर्त खतरे का प्रमाण है, एक बहुत ही कठिन स्थिति, एक ऐसी स्थिति यदि जिससे हम सही से न निपटें तो यह हमारे लिए तथा हमारे नागरिकों की सुरक्षा और इस क्षेत्र के देशों के साथ हमारे संबंधों के लिए और खतरे में परिणित हो सकती है । हम कह सकते थे कि हम स्पष्ट कारणों से किसी मुस्लिम राष्ट्र पर आक्रमण करते हुए नहीं दिखना चाहते और इसीलिए हम ईराक में 2 हज़ार व्यक्तियों का अपना छोटा ज़खीरा नहीं भेजेंगे और इसके परिणाम स्वरूप आप यह युद्ध नहीं हारेंगे । पहली बात तो यह है कि यह एक न हारा जा सकने वाला युद्ध था । वास्तव में मैं सोचता हूँ कि डिक ने कहीं और कहा है कि अपने मित्र के साथ खड़े रहना और जब आपको लगे कि यह उचित होगा अपने मतभेदों को बताना, पूर्णतः संभव है ।

स्यू सलेमन :

तो अंत में समाप्त करते हुए, गठबंधन को मजबूत करने के आस्ट्रेलिया के निर्णय पर क्या आप सोचते हैं कि एशियाई नेताओं की नज़रों में भविष्य में जब आवश्यक हो उन अवसरों पर एशिया के साथ स्वतंत्रता पूर्वक व्यवहार करने की क्षमता पर प्रश्न चिन्ह लगता है ? "

एलीसन ब्रोइनोवसकी :

" मैं निश्चित रूप से मानता हूँ कि यह सत्य है । वास्तव में मैं सोचता हूँ कि हमने यह पूर्णतः स्पष्ट कर दिया है कि हम किस प्रकार निर्णय करेंगे और यह संदेश क्षेत्र की प्रत्येक राजधानी में पहुंच चुका है । इस क्षेत्र में कुछ स्थान ऐसे होंगे जैसे सिंगापुर, सम्भवतः सियोल तथा टोकियो जहाँ यह एक स्वीकार्य संदेश होगा परंतु अन्य राजधानियों में यह बहुत कम स्वीकार्य होगा और निश्चित रूप से प्रत्येक के इन बातों के बारे में भिन्न मत हैं । पर जहाँ तक आस्ट्रेलिया की स्वतंत्रता का संबंध है मैं सोचता हूँ कि इस क्षेत्र में प्रत्येक व्यक्ति यह सोच रहा होगा कि हमने इसे खो दिया है । और वस्तुतः मैं जानता हूँ कि संयुक्त राष्ट्र में भी यही मामला है और लोग कह रहे हैं कि आस्ट्रेलिया कहाँ है ? आस्ट्रेलिया का विभिन्न मुद्दों पर एक स्वतंत्र मत अथवा अपनी अलग आवाज हुआ करती थी । हमने इसे पूर्णतः त्याग दिया हुआ प्रतीत होता है । "

स्यू सलेमन :

पूर्व कूटनीतिज्ञ एलीसन ब्रोइनोवसकी जिनकी पुस्तक अबाउट फेस - एशियन एकाउंट ऑफ आस्ट्रेलिया कहलाती है ।

और अगले सप्ताह - आस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री जॉन हावर्ड राष्ट्रीय संसद के बाहर एक अलग तरीके के प्रश्नकाल में भाग लेंगे जब वह आस्ट्रेलिया तथा अमरीका दोनों के उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के विद्यार्थियों से सितम्बर, 11 के बाद से विश्व के संबंध में प्रश्नों के उत्तर देंगे ।

(विद्यार्थी के प्रश्नों का फिल्म-संग्रन्थन)

विद्यार्थी :

" प्रधान मंत्री महोदय आपसे मेरा पहला प्रश्न .... "

विद्यार्थी :

" क्या आपके दिमाग में इससे कोई नैतिक चिन्ताएं उत्पन्न हुईं ? "

विद्यार्थी :

" क्या आप किसी तरह अपने को उत्तरदायी महसूस करते हैं .... "

विद्यार्थी :

" इससे आपको कैसा लगता है ? "

विद्यार्थी :

" आपको यह क्यों चुनना पड़ा .... "

विद्यार्थी :

" आप व्यक्तिगत तौर पर किन नैतिक मुद्दों से जूझते हैं ? "

स्यू सलेमन:

तब तक के लिए स्यू सलेमन का नमस्कार और मेलबर्न के मोनेश विश्वविद्यालय के नेश्नल सेंटर फ़ॉर आस्ट्रेलियन स्टडीज़ को शैक्षिक सलाह तथा तकनीकी निर्देशन के लिए रेयान ईगन को मेरा धन्यवाद।