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आस्ट्रेलिया इंडिया काऊन्सिल के सहयोग के द्वारा ।

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कार्यक्रम ७- शिक्षा का अंतरराष्ट्रीयकरण

:: अंग्रेज़ी में सुनिए - विनडोज़ मिडिया प्लेएर : मिडिया-संबंधित सहायता

स्यू सलेमनः

नमस्कार¸ मैं हूँ स्यू सलेमन और आप सुन रहे हैं रेडियो आस्ट्रेलिया की कढ़ियाँ वर्तमान आस्ट्रेलिया।

(संगीतः ऐलिस कूपर द्वारा प्रस्तुत स्कूलस आउट)

आज के कार्यक्रम में आस्ट्रेलियाई शिक्षा का अंतरराष्ट्रीयकरण।

पिछले २० वर्षों में उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले २० से ३० वर्ष के आस्ट्रेलियाई लोगों की संख्या में वृद्धि हुई है।

इसी समय में विश्वविद्यालयों में पढ़ने के लिए यहाँ आने वाले अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों की संख्या में भी बहुत ज़्यादा बढ़ोत्री हुई है। आस्ट्रेलिया के विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों में से १८ प्रतिशत विद्यार्थी विदेशी हैं।

इसकी तुलना में अमरीका के विश्वविद्यालयों में केवल ३ प्रतिशत अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थी पढ़ते हैं।

मैंने मेलबर्न के मोनेश विश्वविद्यालय के प्राध्यापक साईमन मारगिनसन से पूछा कि क्या हम इस वृद्धि को 'आस्ट्रेलियाई शिक्षा का अंतरराष्ट्रीयकरण कह सकते हैं'?

साईमन मारगिनसनः

"इसके कई मतलब हो सकते हैं¸ इसका केवल यह मतलब हो सकता है कि अब आस्ट्रेलियाई शिक्षा में आस्ट्रेलिया के बाहर के देशों के बारे में ज़्यादा पढ़ाया जाता है। ऐसा अन्य देशों के अधिक उदाहरणों¸ विदेशी अध्यापकों की संख्या में वृद्धि तथा कक्षाओं में अधिक अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों की संख्या से किया जाता है। यह अन्य संस्कृतियों के बारे में अधिक जानने की प्रक्रिया भी हो सकती है। परन्तु कई लोग शिक्षा के अंतरराष्ट्रीयकरण का सीधा उपयोग भी करते हैं¸ कई बार इसका प्रयोग अंतरराष्ट्रीय समझ-बूझ बढ़ाने¸ दूसरे देशों तक पहुँचने¸ सांस्कृतिक आदान-प्रदान तथा शिक्षा तथा दुनिया के लोगों को एक-दूसरे के करीब लाने के लिए भी किया जाता है और मेरे विचार से सभी विश्वविद्यालयों तथा विद्यालयों का यही उद्देश्य होना चाहिए। इसका इस्तेमाल आस्ट्रेलियाई विश्वविद्यालयों में ज़्यादा अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों को भरती करने के लिए भी किया जा सकता है। मेरा मतलब है कि जब वाईस-चानसलर से सुनते हैं कि हमें अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों की संख्या में वृद्धि करने की आवश्यकता है तो उनका मतलब होता है कि हम और अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों को भरती करें ताकि हमारी आय में बढ़ोत्री हो।"

डेन्निसः

"आप अभी भी सुनते हैं... अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों के कारण आस्ट्रेलियाई लोगों को नौकरियाँ नहीं मिलतीं¸ मैं वाणिज्य पढ़ता हूँ और मुझे यह बात बहुत अजीब लगती है। अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों से हमारे देश को पैसा मिलता है और एक बार आपकी उनसे जान-पहचान हो जाए तो लगता है कि वे भी अच्छे लोग होते हैं।"

स्यू सलेमनः

पिछले कुछ वर्षों से फीस जमा करने वाले मलेशिया के डेन्निस जैसे अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों से आस्ट्रेलियाई विश्वविद्यालयों को एक अरब डालर प्रति वर्ष की कमाई हो रही है।

परन्तु इस कमाई के अतिरिक्त 'अंतरराष्ट्रीयकरण' आस्ट्रेलियाई विद्यार्थियों को सांस्कृतिक आदान-प्रदान करना सिखाता हैं क्योंकि उन्हें अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों से मिलकर अन्य सभ्यताओं के बारे में जानकारी मिलती है जिससे उन्हें भी फायदा होता है।

२८ साल पहले अमरीका से आस्ट्रेलिया आने के बाद से प्राध्यापक होमर ले ग्रेंड ने कई आस्ट्रेलियाई विश्वविद्यालयों में पढ़ाया है। वे मोनेश विश्वविद्यालयों में कला विभाग के अध्यक्ष हैं¸ इस विश्वविद्यालय में सबसे अधिक अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थी पढ़ते हैं।

प्राध्यापक होमर ले ग्रेंडः "सभी आस्ट्रेलियाई विद्यार्थियों को अंतरराष्ट्रीय शिक्षा प्राप्त हो¸ ऐसा सम्भव नहीं है। परन्तु अन्य देशों के विद्यार्थियों के यहाँ आकर उनके साथ पढ़ने से यहाँ के विद्यार्थियों को अलग सोच¸ अलग संस्कृतियों तथा अलग लोगों के बारे में अत्यन्त महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है इसलिए अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों के यहाँ आने से केवल आर्थिक ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण आस्ट्रेलियाई व्यवस्था को फायदा होता है।"

(संगीतः ऐलबम प्लेनेट वर्लड से मोशनरी)

स्यू सलेमनः

शिक्षा के अंतरराष्ट्रीयकरण का एक फायदा है संस्कृतियों के बीच बढ़ता मेल-मिलाप¸ प्रू हार्न को इस बात का अहसास हुआ जब वे जे ई टी के नाम से प्रसिद्ध 'जापान एक्सचेंज ऐंड टीचिंग प्रोग्रेम' में शामिल हुईं।

तीन साल जापान में रहने के बाद प्रू अंतरराष्ट्रीयकरण के बारे में क्या समझती हैं?

प्रू हार्नः

"अंतरराष्ट्रीयकरण की व्याख्या करना बहुत कठिन है परन्तु ३ साल जापान में रहने तथा वहाँ के कई स्थानों पर घूमने के अनुभव के बाद मुझे अहसास हुआ है कि अब मैं अन्य संस्कृतियों¸ परम्पराओं तथा रीति-रिवाज़ों के बारे में ज़्यादा जागरूक हूँ¸ मुझे अब विभिन्न सभ्यताओं के बीच के अंतर का अहसास है तथा मैं जानती हूँ कि इनका आदर करना कितना आवश्यक है।"

स्यू सलेमनः

प्रू हार्न उन ४०० युवा आस्ट्रेलियाईयों में से एक हैं जो हर वर्ष जापान एक्सचेंज ऐंड टीचिंग प्रोग्रेम' यानी जे ई टी में भाग लेते हैं। जे ई टी की स्थापना जापान सरकार ने सन् १९८७ अपने समुदायों की दुनिया की अन्य सभ्यताओं के बारे में जानकारी बढ़ाने के उद्देश्य से की थी।

प्रू के 'विदेशी विद्यार्थी' होने के अनुभव ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों की उन ज़रूरतों के बारे में जागरूक किया है। वे आस्ट्रेलिया के दक्षिणी राज्य के टेसमेनिया विश्वविद्यालय में कार्य करती हैं तथा स्टूडेंट ट्रेवल में आने वाले अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों की ज़रूरतों को अब वे अच्छे से समझ सकती हैं।

प्रू हार्नः

"मैं दूसरी संस्कृतियों के प्रति बहुत संवेदनशील हूँ¸ मैं दूसरों को तथा दूसरों के देशों को मान्यता देने में विश्वास रखती हूँ¸ लोगों की भाषा तथा आस्ट्रेलिया में उन पर पड़ने वाले सांस्कृतिक प्रभाव¸ उनके व्यवहार तथा उनकी बातों के तात्पर्य को समझने का मैं प्रयत्न करती हूँ। अकेलापन¸ डर¸ घबराहट तथा नए देश की बातों को न समझ पाना उन्हें एक बार फिर एक बच्चा बना देता है जो अभी सीख ही रहा हो बावजूद इसके कि वे अपने देश में तथा अपनी भाषा में बहुत सुचारू तथा दृढ़निश्चय से कार्य कर सकते हैं तथा अपना ध्यान अच्छे से रख सकते हैं। मुझे आस्ट्रेलिया तथा जापान में भाषा में सबसे बड़ा अंतर दिखाई देता है। जापानीयों को वह विदेशी बहुत अच्छे लगते हैं जो उनकी भाषा बोलने का प्रयत्न करते हैं तथा यदि विदेशी उनकी भाषा बोलने में गलती कर दें तो भी वे बुरा नहीं मानते यह सोचकर कि विदेशी कम से कम उनकी भाषा बोलने का प्रयत्न तो कर रहे हैं। हम आस्ट्रेलिया में भाषा के बारे में जापान से बहुत कुछ सीख सकते हैं।"

स्यू सलेमनः

तो पढ़ाई के उद्देश्य से आस्ट्रेलिया आने वाले युवा जापानी विदेश में रहने की किस प्रकार आदत डालते हैं?

जापानी विद्यार्थीः

"मेरा नाम फुसाका है¸ मैं जापान से हूँ। मैं तीन सालों से यहाँ पर हूँ और मुझे आस्ट्रेलियाई मित्र बनाने में बहुत कठिनाई हुई क्योंकि मुझे अच्छे से अंग्रेज़ी बोलनी नहीं आती। पर अब सब कुछ ठीक है¸ आपको दूसरी भाषा बोलने में डरना नहीं चाहिए¸ यदि आप कोई गलती करें¸ तब भी नहीं¸ आपको बाहर जाकर सबसे मिलना चाहिए ताकि आपको एक अच्छा अनुभव हो।"

स्यू सलेमनः

जितना ज़्यादा अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थी विभिन्न संस्कृतियों के लोगों से मिलेंगें¸ वह संस्कृतियाँ जो सम्कालीन आस्ट्रेलिया का आधार हैं¸ उनके लिए इस नए वातावरण को अपनाना उतना ही आसान होगा।

मेलबर्न विश्वविद्यालय की मलेशिया की एक छात्रा ने अपने 'अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थी' होने के अनुभव का निम्नलिखित रूप से विवरण किया है।

मलेशियन विद्यार्थीः

" मेरी मुख्य समस्या थी वातावरण¸ मौसम¸ संस्कृति¸ कार्यभार तथा पढ़ाई के नए तरीकों की आदत डालना। अलग उच्चारण¸ भाषा¸ पढ़ाई का अलग तरीका तथा नए मित्र बनाने जैसी छोटी-छोटी समस्याओं का सामना करना पड़ता है तथा इन समस्याओं के कारण मानसिक तनाव भी होता है। यह स्थान बहुसांस्कृतिक है¸ एक महानगर है और जब मैं यहाँ आई थी तो मैं ऐसा ही स्थान चाहती थी। और मेरे विचार से यही कारण है कि अपनी पढ़ाई समाप्त करने के बाद भी अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थी यहाँ पर कार्य करना पसंद करते हैं¸ उन्हें यहाँ की संस्कृति¸ यहाँ के लोगों तथा दोस्तों की आदत पड़ जाती है। यहाँ आप जो करना चाहें कर सकते हैं और कोई भी आप पर ऊँगली उठा कर यह नहीं कह सकता कि आप ग़लत कर रहे हैं। यहाँ का समाज खुले विचारों का है¸ यहाँ किसी पर भी किसी प्रकार का दबाव नहीं डाला जाता और मैं जहाँ से आई हूँ उसकी तुलना में यहाँ के लोग आपके बारे में न्यायशील नहीं होते और मुझे यहाँ की यह बात सबसे अच्छी लगती है..."

स्यू सलेमनः

और अब होंग कोंग से आए बेरनार्ड तथा नेथानील की ओर से आने वाले नए अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों को कुछ सुझाव।

बेरनार्डः

"पढ़ाई के लिए आस्ट्रेलिया अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों

के लिए एक अच्छी जगह है¸ परन्तु अपना ध्यान रखना तो यहाँ आने के बाद सीखना पड़ता है। यदि किसी में अभी भी बचपना है तो और ज़्यादा सावधानी की आवश्यकता होगी। यहाँ पर आपको अपने मित्रों पर ही निर्भर करना पड़ता है। और हाँ¸ यदि आपको किसी प्रकार की सहायता की आवश्यकता हो तो बेझिझक आप अपने विश्वविद्यालय के दफ़्तर में जाकर मदद माँग सकते हैं¸ यहाँ के लोग बहुत मैत्रीपूर्ण होते हैं।"

नेथानीलः

"हाँ¸ मुझे भी यही कहना है¸ आपको ही यहाँ पर रूचि दिखानी होगी¸ स्वयं आपकी सहायता कोई नहीं करेगा¸ आपको अपनी सहायता करने की आदत भी डालनी होगी।"

स्यू सलेमनः

आस्ट्रेलिया में अधिकतर अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थी सिंगापोर¸ होंग कोंग¸ मलेशिया तथा इंडोनिसिया से आते हैं। मैंने मोनेश विश्वविद्यालय के कला विभाग के अधिकारी होमर ले ग्रेंड से पूछा कि अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों को यहाँ पर रहने तथा पढ़ने की आदत डालने के लिए विश्वविद्यालय कितनी सहायता करते हैं...

प्राध्यापक होमर ले ग्रेंडः "मैं अन्य विश्वविद्यालयों की तो बात नहीं कर सकता परन्तु मोनेश में बहुत अच्छी तरह से सहायता की जाती है¸ यहाँ आने से पूर्व विद्यार्थियों को यहाँ के बारे में जानकारी दी जाती है ताकि उन्हें कुछ अनुमान हो जाए कि यहाँ पर उन्हें कैसे वातावरण का अनुभव होगा तथा उनके पहले कुछ सप्ताह कैसे होंगे, उन्हें अन्य प्रकार की सहायता भी प्रदान की जाती है। मैं यहाँ के जितने भी विश्वविद्यालयों के बारे में जानता हूँ¸ वहाँ पर भाषा तथा पढ़ाई के लिए विशेष लोगों को र्नियुक्त किया जाता है तथा नए विद्यार्थियों को यहाँ की परिस्थितियों के बारे में जानकारी दी जाती है। बाहरी विद्यार्थियों के लिए अंग्रेज़ी दूसरी भाषा होती है तथा यहाँ की संस्कृति भी उनकी संस्कृति से अलग होती है इसलिए इन दोनों विषयों पर भी जानकारी दी जाती है। यह बातें यहाँ की शिक्षा व्यवस्था तथा यहाँ के अध्यापकों¸ विशेषकर कला विभागों में अच्छे से सम्मिलित हैं। उदाहरण के रूप में¸ दक्षिणी पूर्व ऐशिया अथवा उत्तरी ऐशिया के विद्यार्थी किसी ऐतिहासिक घटना के बारे में यदि ज़्यादा नहीं जानते तो उनके प्रश्नों के उत्तर देने का पूर्ण रूप से प्रयत्न किया जाता है¸ बार-बार दिया जाता है¸ उत्तर को अत्यन्त सरल बना कर समझाया जाता है¸ कई बार तो ऐसा करना भी ग़लत माना जाता है परन्तु इसे ठीक करने के लिए हमें अपनी शिक्षा व्यवस्था पर ही सोच विचार करना होगा।"

लेनः

"जब मैं कॉलेज में थी तो मैंने अंग्रेज़ी अपने मुख्य विषय के रूप में पढ़ी थी¸ मैं इसलिए अब यहाँ पर हूँ तथा मैं इस भाषा के बारे में ज़्यादा जानती हूँ।

स्यू सलेमनः

ऐरलेनावती या अपनी आस्ट्रेलियाई सहेलियों के लिए 'लेन' पूर्वी इंडोनिसिया से हैं तथा वहाँ पर आपने आस्ट्रेलियाई सरकारी छात्रवृत्ति हासिल की थी।

"लेन आप कह रही थीं कि आप मोनेश विश्वविद्यालय में हैं तथा आपका बेटा यहाँ के एक स्कूल में पढ़ता है। क्या आप हमें उसके यहाँ आने तथा आस्ट्रेलियाई लोगों के बीच यहाँ के स्थानीय स्कूल में पढ़ने के अनुभव के बारे में बता सकती हैं। क्या यहाँ पढ़ाई करने के बाद उसकी यहाँ के बारे में बनी छवि में कुछ अंतर आया है¸ वह छवि जो उसके मन में इंडोनिसिया में थी।

लेनः

हाँ¸ मुझे याद है कि पहली बार स्कूल जाने के बाद वो काफी चकित था¸ एक दिन उसने मुझे बताया कि उसकी कक्षा के बच्चे विनम्र नहीं हैं। मैंने पूछा कि ऐसा क्यों है तो उसने बताया कि वे बहुत सवाल पूछते हैं¸ बहुत बोलते हैं¸ बहस करते हैं¸ आलोचना करते हैं तथा कभी भी कक्षा से बाहर चले जाते हैं। मैंने उसे समझाया कि ऐसा करना यहाँ का चलन है¸ इस देश के लोगों की यही संस्कृति है। फिर एक दिन उसके अध्यापक ने मुझे बताया कि उसके अंक काफी कम हैं तथा वह कक्षा में ज़्यादा योगदान नहीं देता। मैंने उसके अध्यापक को समझाने का प्रयत्न किया कि हमारे देश में विभिन्न तरीकों से पढ़ाया जाता है¸ हम केवल प्रश्नोत्तर करते हैं परन्तु हमें आलोचना करना¸ विशलेषण करना तथा दूसरों के नज़रीए से देखना नहीं सिखाया जाता। वह अब तीन सालों से यहाँ पर है तथा उसकी आस्ट्रेलिया के बारे में¸ विशेषकर उसकी अपने स्कूल के प्रति सोच में बदलाव आया है। अब मैं उसे उसके निबन्ध स्वयं ही करने देती हूँ¸ अब वह आलोचना कर सकता है तथा कक्षा में ज़्यादा भाग लेता है।"

स्यू सलेमनः

ऐरलेनावती आस्ट्रेलिया इंडोनिसिया से आस ऐड छात्रवृत्ति पर आईं हैं। समाजशास्त्र अध्यापक बोब कोनेल¸ जो अमरीका और युरोप के विश्वविद्यालयों में पढ़ा चुके हैं और अब सिडनी विश्वविद्यालय में शिक्षा प्रदान करते हैं¸ का कहना है कि वे आस्ट्रेलिया में शिक्षा को एक "व्यापार" के रूप में नहीं बल्कि एक "सहायक" के रूप में देखना चाहेंगे।

बोब कोनेलः

"यदि हम शिक्षा को एक अर्थ-व्यवस्था के रूप में प्रस्तुत करेंगे तो हम संस्कृतियों के बीच आदान-प्रदान नहीं कर सकते। आज कई लोग विकासशील देशों की ओर अधिक ध्यान देना चाहते हैं परन्तु इसे सम्भव बनाने के लिए संस्थापनों में परिर्वतन की आवश्यकता है।"

स्यू सलेमनः

आज शिक्षा आस्ट्रेलिया का आठवाँ सबसे बड़ा उद्योग है और कई विश्वविद्यालयों की अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों से उपलब्ध होने वाली आय ५० प्रतिशत से अधिक है।आस्ट्रेलिया के विश्वविद्यालयों को सन् १९८५ से अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों से भी सामान्य फीस लेने की प्रक्रिया की अनुमति दी गई थी। प्रसिद्ध शिक्षा अनुसंधानकर्ता प्राध्यापक साएमन मारगिनसन का मानना है कि अचानक से विश्वविद्यालयों का अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों से मिलने वाली आय पर निर्भर करना केवल एक संयोग नहीं है बल्कि इसका कारण है सरकार द्वारा उच्च शिक्षा के क्षेत्र में दी जाने वाली निधि में कटौती।

साएमन मारगिनसनः

"फीस में सबसे पहले की गई कमी के साथ साथ अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों की फीस के नियमों में कुछ बदलाव किए गए। विश्वविद्यालयों को कहा गया था कि अब वे किसी भी मात्रा में अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों को भरती कर सकते हैं तथा अपनी इच्छा से फीस ले सकते हैं¸ बस उन्हें इस बात का ध्यान रखना होगा कि इससे आर्थिक रूप में पूर्ण लाभ हो तथा फीस में किसी भी प्रकार का अनुदान न हो। अधिक से अधिक संख्या में अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों को भरती करने की अनुमति प्रदान की गई। फलस्वरूप जहाँ सरकारी निधि तथा लोड टारगेट स्वदेशी विद्यार्थियों के लिए कुछ कम थे¸ वहीं अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों की संख्या पर रोक नहीं थी¸ कारणवश विश्वविद्यालयों ने इस छोटे से स्त्रोत से अपनी आय में वृद्धि का प्रयत्न किया। ऐसा करने के बाद १९९० में केवल १२००० विद्यार्थियों से पैसा कमाने के स्थान पर अब वे १००००० विद्यार्थियों की फीस से पैसा कमा रहे थे और अब स्थिति ऐसी है कि हर १० डालरों में से १ डालर की कमाई अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थी से होती है और कारणवश सरकार ने सार्वजनिक निधि में और भी कटौती की है।"

स्यू सलेमनः

"आज आस्ट्रेलियाई सरकार के सामने मुख्य सवाल है कि विश्वविद्यालयों को कई वर्षों की निधि में कटौती के बाद फिर से संघीय बजट खर्चा प्रदान किया जाए या इसे और ज़्यादा अनियमित कर दिया जाए ताकि सभी विश्वविद्यालय स्वयं ही स्वदेशी तथा अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों के लिए फीस निश्चित कर सकें। प्राध्यापक होमर ले ग्रेंड के विचार...

प्राध्यापक होमर ले ग्रेंडः

"यदि विद्यार्थी कोई ज़्यादा प्रसिद्ध विषय करना चाहें तो ऐसा सफलतापूर्वक किया जा सकता है। उदाहरण के लिए कानून के विषय में मोनेश¸ क्वीनस्लैंड तथा मैलबर्न विश्वविद्यालयों में अधिक विद्यार्थियों को भरती किया जा सकता है¸ जिसका परिणाम अच्छा या बुरा¸ दोनों ही प्रकार का हो सकता है।"

स्यू सलेमनः

प्राध्यापक बोब कोनेल के अनुसार इसका बुरा परिणाम हो सकता है। बोब कोनेल जैसे शिक्षा संशोधनकर्ताओं के अनुसार देश की ऊपरी प्रथम दस भागीदारी आस्ट्रेलिया के सबसे बड़े क्षेत्रों सिडनी तथा मेलबर्न के उपनगरों से होती है।

बोब कोनेलः

"हमारे शोध के अनुसार देश के उच्च वर्गों तथा प्रमुख उपनगरों से आए बच्चों के लिए विश्वविद्यालयों में प्रवेश लेना ज़्यादा आसान होता है तथा उन्हें अच्छे वेतनों वाली नौकरियाँ भी ज़्यादा आसानी से मिलती हैं। वर्गों में असमानता शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी हुई है तथा कई पीढ़ियों से आस्ट्रेलियाई शिक्षा व्यवस्था इस समस्या का सामना कर रही है।

स्यू सलेमनः

मैंने अपने जीवन में देखा है कि कई उच्च वर्गों के बच्चे स्थानीय उच्च शिक्षा विद्यालय में पढ़ाई करते हैं तथा यदि वे पढ़ाई में अच्छे हों तो वे विश्वविद्यालयों में भी शिक्षा प्राप्त करते हैं। क्या इसमें कुछ बदलाव आया है?

बोब कोनेलः

नहीं¸ अब हमारी माध्यमिक शिक्षा व्यवस्था बहुत अच्छी है तथा हर प्रकार के सामाजिक वर्गों के बच्चे इसे पढ़ने के बाद उच्च शिक्षा भी प्राप्त करते हैं। यदि कुछ बदलाव आया है तो वह है उच्च स्तर की प्रतिस्पर्धा¸ सबसे अच्छे विश्वविद्यालयों में अपने विषय हासिल करने की और अपने परिवार तथा विद्यालय के साधन इस्तेमाल करने की। एक और बदलाव आया है कि सरकार अब निजी विद्यालयों को सरकारी विद्यालयों की तुलना में अधिक निधि प्रदान करती है जिससे की सार्वजनिक शिक्षा में कमी आई है। इसके कारण समाज में कई स्तरों का विभाजन हो गया है¸ विशेषकर शिक्षा व्यवस्था में वर्गों का विभाजन¸ इसलिए आज इस व्यवस्था के कारण ज़्यादा असमानता पैदा हो रही है और पहले ऐसा नहीं था।"

स्यू सलेमनः

आस्ट्रेलिया के महानगरों के बाहर के पृष्ठ प्रदेश से शहरों में उच्च शिक्षा प्राप्त करना उतना ही कठिन है जितना इन शिक्षा स्थलों में भरती होना कठिन है। विक्टोरिया राज्य की राजधानी मेलबर्न से २०० कि मी दूर अत्यधिक खेती तथा फलों की पैदावार वाले उत्तर पूर्वी इलाकों गोलबर्न वैली के शहर ग्रेटर शेपारटन के सी ई ओ बिल जबूर हैं।

बिल जबूरः

"हाँ¸ इसमें काफी खर्चा होता है... मेरी दो बेटियाँ हैं तथा उन्होंने शहरों में न जाने का फैसला किया है¸ मेरी किस्मत अच्छी है कि एक ने यहाँ रहने का फैसला किया है तथा दूसरी किसी और क्षेत्र में गई है। परन्तु इसकी तुलना में यदि मेलबर्न में रहने¸ खाने तथा अन्य सभी व्यवस्थाओं का खर्चा देखा जाए¸ तो वह बहुत¸ बहुत महँगा पड़ता है¸ अपने बच्चों को २०० कि मी दूर मेलबर्न में पढ़ाना कई परिवारों के लिए कठिन होता है।

स्यू सलेमनः

हाँ¸ शायद विदेशी लोग इससे सहमत होंगे क्योंकि वे बहुत दूर से सफर कर यहाँ पर पढ़ाई करने के लिए आते हैं ?

बिल जबूरः

हाँ¸ ऐसा ही है¸ और हमारी स्थिति में तो सामान्य सार्वजनिक परिवहन भी उपलब्ध नहीं होता¸ रेलगाड़ी होती है¸ ढ़ाई घंटे का रेल का सफर और आप हर रोज़ यह सफर कर विश्वविद्यालय में पढ़ाई करने नहीं आ सकते।"

स्यू सलेमनः

ग्रेटर शेपारटन की ग्रामीण नगरपालिका संघीय सरकार से एक उच्च शिक्षा केन्द्र की माँग कर रही है। वे विद्यालय से शिक्षा पूर्ण करने वाले विद्यार्थियों को अधिक सुसंस्कृत ग्रामीण निर्यात उद्योगों तथा फूड प्रोसेसिंग प्लांटस के लिए ज़रूरी निपुणता प्राप्त करते हुए देखना चाहेंगे।

बिल जबूरः

"क्योंकि हमारे क्षेत्र में बहुत ज़्यादा खेती तथा उद्यानकृषि है इसलिए हम स्कूल समाप्त होते ही डेरियों¸ खेतों तथा फल उद्यानों में नौकरियाँ हासिल कर सके हैं। इसलिए हमने शारीरिक शक्ति तो प्रदान की है परन्तु हम दिमागी तौर पर इसका समीकरण नहीं कर पाए हैं। आस्ट्रेलिया के कई बड़े फूड प्रोसेसिंग कारखाने अब इस क्षेत्र में कार्य करते हैं जो कई प्रकार के वैज्ञानिकों¸ दवाई विक्रेताओं¸ व्यापारियों¸ मुनीमों तथा उन उच्च शिक्षित लोगों¸ जो अपना व्यापार आगे बढ़ाना चाहते हैं¸ को नौकरियाँ प्रदान कर रहे हैं। इसलिए अब शारीरिक शक्ति की तुलना में मानसिक शक्ति ज़्यादा उपलब्ध होगी। हमें विभिन्न बनाने वाला एक और विषय यह है कि हमारी ४२ प्रतिशत जनसंख्या अंग्रेज़ी न बोलने वाले लोगों से बनी है तथा १० प्रतिशत जनसंख्या ऐबोरजीनी लोगों की है। यह दोनों दल अपने घर को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं। इसलिए वे टरज़िएरी शिक्षा के आगे कुछ देखने का प्रयत्न भी नहीं करते।"

कोलिन बर्कः

"आज भी यह कहना सही होगा कि आस्ट्रेलियाई विश्वविद्यालयों के कई स्वदेशी विद्यार्थी सैकेंड चान्स विद्यार्थी होते हैं। वे कक्षा ८¸ ९ या १० के बाद ५ से १० साल तक काम करते हैं और फिर जब उन्हें लगता है कि अब उन्हें शिक्षा की आवश्यकता है¸ वे विश्वविद्यालय में पढ़ने आ जाते हैं। ऐसे स्वदेशी विद्यार्थियों का हमारी व्यवस्था में सबसे अधिक प्रतिशत है।"

(संगीतः ऐलबम प्लेनेट वर्ल्ड से प्रस्तुत मोशनरी)

स्यू सलेमनः

आस्ट्रेलियाई ऐबोरजीनी लोगों की शिक्षा पर टिपण्णी देने के लिए प्राध्यापक कोलिन बर्क बिल्कुल उपयुक्त हैं। आप एक ऐबोरजीनी अध्यापक तथा एक शैक्षिक संशोधनकर्ता हैं¸ आपने संघ सरकार को विद्यालयों तथा विश्वविद्यालयों में स्वदेशी आस्ट्रेलियाई लोगों के सुधार के लिए प्रतिवेदन दिए हैं।

प्राध्यापक बर्क को चिन्ता है कि एक चौथाई से भी कम स्वदेशी आस्ट्रेलियाई लोग माध्यमिक स्कूल की शिक्षा पूरी करते हैं जिसकी तुलना में ७६ प्रतिशत अन्य आस्ट्रेलियाई लोग शिक्षा प्राप्त करते हैं। इसके अतिरिक्त विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले पिछड़े हुए इलाकों के स्वदेशी विद्यार्थी बहुत कम होते हैं।

कोलिन बर्कः

"कई विश्वविद्यालयों के स्वदेशी विद्यार्थी महानगरों तथा शहरों के पास के ग्रामीण इलाकों के होते हैं। उन्हें ज़्यादा बेहतर अवसर मिलते हैं तथा पढ़ाई में उन्हें ज़्यादा कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ता परन्तु पिछड़े हुए क्षेत्रों के लोगों तथा उत्तरी भाग के लोगों में से बहुत कम लोग विश्वविद्यालयों में पढ़ते हैं¸ सिर्फ उन क्षेत्रों के अतिरिक्त जो ऐसे लोगों के लिए विषय उपलब्ध करवाते हैं। अध्यापकों के प्रशिक्षण पर साउथ आस्ट्रेलिया विश्वविद्यालय में पितजांदारा क्षेत्र के लोगों के लिए विषय उपलब्ध हैं तथा और कई विश्वविद्यालयों के साथ साथ उत्तरी क्वीनसलैंड के जेम्स कुक विश्वविद्यालय में भी विषय उपलब्ध किए जाते हैं। परन्तु जो विश्वविद्यालय यह माँग करते हैं कि विद्यार्थी विश्वविद्यालय में अपने समुदाय से दूर स्वयं यहाँ रहकर पढ़ाई करें¸ तो फिर वे सफल नहीं हो पाते तथा बहुत कम विद्यार्थी ऐसे विषय पढ़ते हैं। और ऐसे बहुत कम विद्यार्थी होते हैं जो उस निपुणता तथा शैक्षिक क्षमता के हों जिसकी आवश्यकता दक्षिणी आस्ट्रेलिया के विश्वविद्यालयों के विषयों को पढ़ने के लिए होती है।"

स्यू सलेमनः

शेपारटन का प्रस्तावित शिक्षा केन्द्र उस क्षेत्र के ऐबोरजीनी तथा अन्य समुदायों के लोगों के लिए एक सुखद समाचार है।

कोलिन बर्क के शोध से मालूम होता है कि जो स्वदेशी विद्यार्थी अपने पिछड़े हुए इलाकों से बाहर जाकर शहरों में नहीं पढ़ते¸ उनकी सफलता का प्रतिशत ७० होता है उन ५० प्रतिशत सफल विद्यार्थियों की तुलना में जो बाहर जाकर पढ़ाई करते हैं।

बिल जबूर का शेपारटन दल ओपन लर्निंग आस्ट्रेलिया के साथ कार्य करता है¸ जो डिस्टेंस शिक्षा उपलब्ध करते हैं¸ अपने नारे "शिक्षा जो आप तक पहुँचे" के साथ।

बिल जबूरः

"हम अपनी पसंद के कमरों में बैठ कर पढ़ने वाले विद्यार्थियों को विडियो भी उपलब्ध करवाते हैं तथा हम उन्हें कुछ और सुविधाएँ भी देना चाहते हैं ताकि वे विश्वविद्यालय में आकर यहाँ का मज़ा भी ले सकें तथा एक दूसरे से मिल सकें। इसलिए हम डिस्टेंस शिक्षा और पुराने तरीकों का मिश्रण उपलब्ध करवाना चाहते हैं।

स्यू सलेमनः

मुझे लगता है कि ऐसा करने से आप कुछ ऐसे शहरों के विद्यार्थियों को आमंत्रित कर रहे हैं जो ज़्यादा आराम वाले वातावरण में पढ़ना चाहते हैं।

बिल जबूरः

शायद¸ परन्तु यह मेरी सोच के बाहर है कि मेलबर्न से कुछ दूर आकर विद्यार्थी गोलबर्न नदी के किनारे के क्षेत्रिय विक्टोरिया के वातावरण में रहना पसंद करेंगे या नहीं।

स्यू सलेमनः

और विदेशी विद्यार्थी¸ बिल।

बिल जबूरः

हम विदेशी विद्यार्थियों का स्वागत करते हैं। ग्रेटर शेपारटन में हमारा बहुसांस्कृतिक समाज है तथा पिछले कुछ समय में मध्य पूर्व देशों के लोग यहाँ आकर बस गए हैं तथा कई लोग इटली¸ ऐलबेनिया तथा तुर्की से भी हैं तथा महानगरों के बाहर की सबसे ज़्यादा ऐबोरजीनी जनसंख्या है। इसलिए यहाँ बहुत अनेकता तथा बहुसंस्कृति है और हम अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों का भी स्वागत करते हैं।"

(संगीतः ऐलबम वर्ल्ड इन राईम से डिजेरो प्लस कोटो)

स्यू सलेमनः

बिल जबूर क्षेत्रिय विक्टोरिया के ग्रेटर शेपारटन शहर के सी ई ओ हैं।

आप सुन रहे थे रेडियो आस्ट्रेलिया की कढ़ियाँ वर्तमान आस्ट्रेलिया। मुझे आशा है कि अगले सप्ताह आप मेरे यानी स्यू सलेमन के साथ होंगे हमारे अगले कार्यक्रम "ऐशिया को समझने की कोशिश" में। हम बात करेंगे कि किस प्रकार हमारे स्कूल तथा विश्वविद्यालय युवा आस्ट्रेलियाई लोगों को ऐशिया के बारे में जागरूक करने का प्रयत्न कर रहे हैं।

मोनेश विश्वविद्यालय के नेश्नल सेंटर फार आस्ट्रेलियन स्टडीज़ को शैक्षिक सलाह तथा तकनीकी निर्देशन के लिए रयान ईगन को मेरा धन्यवाद।